28 जनवरी 2026

अथ श्री बहुजन बाबा जी कथा…अध्याय प्रथम – संसिया टैक्स

अथ श्री बहुजन बाबा जी कथा…
अध्याय प्रथम – संसिया टैक्स

अरुण साथी

दुनिया में राजतंत्र की समाप्ति के पश्चात लोकतंत्र का उदय हुआ। लोकतंत्र में वोट बैंक का सर्वोपरि महत्व स्थापित हुआ। तभी बाबा जी ने इस महत्व को भली-भांति समझते हुए एक अति-आधुनिक तथा अति-प्रगतिशील राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा को जन्म दिया। इसे वोट-तंत्र कहा गया। वोट-तंत्र में “जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ।
यह सिद्धांत आर्यावर्त नामक राज्य में खूब फला-फूला। अनेक क्षत्रपों ने जातिवाद के इस मूल मंत्र को समझा, उसे व्यवहार में उतारा और देखते-ही-देखते राजा बन बैठे। इस सिद्धांत के अंतर्गत अधिक आबादी वालों ने पहले लघु आबादी वालों की भूमि छीनी, फिर उनकी नौकरियाँ छीन लीं और अंततः उनसे शिक्षा का अधिकार भी छीन लिया।

तब भी बहुजनों को संतोष न हुआ। होना भी नहीं चाहिए था। बहुजनों ने कहा कि एक हज़ार वर्ष पूर्व उनके साथ घोर शोषण हुआ था, जिसका प्रतिशोध लेना अनिवार्य है। इसी सिद्धांत के तहत लघुजनों से बोलने का अधिकार भी छीन लिया गया।

धीरे-धीरे यह अति-प्रगतिशील समाज और अधिक बहुजन-हितकारी होता चला गया। अंततः लघुजनों पर संसिया टैक्स लागू कर दिया गया।

इस व्यवस्था में सांस लेने पर कर (टैक्स) लगाया गया। जितनी बार कोई सांस लेगा, उतनी ही बार उसे कर अदा करना होगा। यह व्यवस्था बहुजनों को अत्यंत प्रिय लगी। इसे न्यायपूर्ण और नीतिसंगत घोषित किया गया। कहा गया कि पुरखों द्वारा किए गए शोषण की भरपाई के लिए इतना तो आवश्यक ही है।

बहुजनों ने उत्सव मनाया। संसिया टैक्स न देने वालों के लिए दंड का विधान किया गया। बकाया कर के लिए “प्रति टैक्स, प्रति कोड़ा” बहुजनों द्वारा लगाए जाने का प्रावधान निर्धारित हुआ।

इससे समस्त बहुजन आह्लादित हो उठे। वे अपने राजा की जय-जयकार करने लगे। अति-आधुनिक और अति-प्रगतिशील राजनीतिक सिद्धांत प्रदान करने वाले बाबा जी की सर्वत्र स्तुति होने लगी। हर ओर बाबा जी की पूजा-अर्चना आरंभ हो गई।

राज्य का नाम परिवर्तित कर नीला अम्बर कर दिया गया। सभी नीले वस्त्र धारण करने लगे, नीला टीका लगाने लगे। जो नीला टीका न लगाता, उसे दंडित किया जाता। उधर, गरीब और लाचार लघुजन धीरे-धीरे सांस लेना कम करने लगे। परिणामस्वरूप वे शीघ्र ही इस लोक को त्याग कर इश्लोक गमन करने लगे। कालांतर में इस धरा-धाम से लघुजन विलुप्त हो गए।

तत्पश्चात सभी बहुजन सुख, शक्ति और समृद्धि के साथ जीवन यापन करने लगे।

इति श्री रेवा-खंडे… अध्याय प्रथम… समाप्त…
प्रेम से बोलिए—बाबा जी जय।

24 जनवरी 2026

रॉलेट एक्ट जैसा UGC का काला कानून वापस लो

रॉलेट एक्ट जैसा UGC का काला कानून वापस लो


संविधान ने जातिगत भेदभाव नहीं होने का अधिकार दिया है। पर हमारे देश के राजनीतिज्ञ जातिगत भेद भाव को वोट की राजनीति के तहत उपयोग कर समाज को बांटा रहे । इसमें कई नाम है। 1919 में अंग्रेजों ने काला कानून रॉलेट एक्ट लाया था। फिर मंडल आंदोलन में बीपी सिंह के बाद लालू यादव ने भूराबाल साफ करो का नारा दिया। मायावती ने तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार का विष बेल बोया। इसी पर काम किया। 
बीजेपी और मोदी सरकार ने पहले sc, st ACT पर सुप्रीमकोर्ट का झूठे मुकदमे को देख दिया फैसला बदल कर वही किया। आज यह मुकदमा 95 प्रतिशत झूठा होता है।

अब नरेंद्र मोदी की सरकार ने UGC के द्वारा पुनः जातिगत भेद भाव की लंबी लकीर खींच दी। 
अब विश्विद्यालय में पढ़ने वाले sc st और obc विद्यार्थी को पीड़ित मान लिया। और सवर्ण समाज को पीड़क, अत्याचारी, खलनायक मान लिया। यही नियम लागू किया गया। अब एक समिति बनेगी जो केवल आरोप लगाने भर से केवल सवर्ण  विद्यार्थी को दोषी माना जाएगा। समिति इसपर कार्रवाई करेगी। 

कॉलेज से निष्कासन, निबंधन रद्द, पुलिस में हवाले और जेल। मतलब, जिस किसी सवर्ण विद्यार्थी पर sc, st, OBC के द्वारा जातिगत भेद भाव का आरोप लगा, उसका जीवन सर्वनाश हो जाएगा। 


इतना ही नहीं, यही स्थिति कॉलेज में पढ़ाने वाले प्रोफेसर पर भी लागू है । अब, गुरुजी भी इनसे डरे डरे रहेगें।


और यह काला कानून समानता का कानून के नाम पर लाया गया। पर इसमें पहले जांच का प्रावधान नहीं। इसमें झूठा आरोप लगाने पर कोई सजा नहीं...!


यह रोहित बोमिला के केस के बहाने हुआ। वही रोहित बोमिला जो कानूनी रूप से  sc साबित नहीं हुआ। उसकी आत्महत्या के कारण में जातीय भेदभाव स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया। यह सब नरेटिव बनाया गया। 


अब यूजीसी ने एक भयानक काला कानून थोप दिया है। अब बीजेपी और नरेंद्र मोदी की सरकार ने वोट बैंक के लिए बांटने का और बड़ा काम किया। 


यह क्यों हुआ..? यही होता है। नेता यही करते है। स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक यही होता है। जो उनके साथ है नेता उसका महत्व नहीं देते। जो जितना प्रखर विरोध में होता है, उसे अपने साथ लाने का सारा जतन नेता करता है। 

यूजीसी के माध्यम से वही किया गया। जो कुछ sc और OBC बीजेपी का प्रखर विरोध करते थे, उसी को साधने के लिए यह किया।


अब जो बीजेपी के प्रबल समर्थक थे। जिनको भक्त कहके गाली दी जाती है, बीजेपी ने उन्हीं पर प्रहार किया। 

अब यह भी समझिए। Sc, st, OBC के विरुद्ध कोई अत्याचार हो। कोई कानून बने , तो कोई न कोई सवर्ण उसका विरोध करेगा। उनके साथ खड़ा होगा। अत्याचार का विरोध करते हुए अपने समाज से लड़ेगा। पर जब सवर्ण पर अत्याचार हो तो सारा का सारा गैर सवर्ण या तो प्रसन्न होगा या मौन साध लेगा।


अब देखिए। समाज के रहकर, कई बार sc के साथ अत्याचार का प्रखर विरोध किया। और पत्रकारीय यात्रा में कई ऐसे लोग को जानता हूं जो sc st ACT के तहत फर्जी मुकदमा करने के लिए प्रसिद्ध है। जरा सा पैसे के लालच में वह किसी पर मुकदमा करता है। क्या ऐसे लोगों की जांच नहीं होनी चाहिए। पर होता यह है कि मुकदमा करने के लिए उनको बिहार सरकार के द्वारा एक लाख तक सरकारी सहायता दी जाती है। 

स्थिति भयावह है। मतलब यह कि अब सवर्णों को इस देश में रहने, जीने का मूलभूत अधिकार तक  यह छीन लिया जाएगा...!

पूरे भारत में सवर्ण समाज 10 प्रतिशत होगा। मतलब अल्पसंख्यक। तब, अब एक ही उपाय बचा है। सारे सवर्ण समाज को उठा कर देश निकाला दे दो। उठा का समुद्र में फेंक दो। या  जब सवर्ण समाज आज भी इतना अत्याचारी है तो इसे भी किसी टापू पर भेज दो। वहीं यह जी लेगा...

#UGC_RollBack #UGCRegulations #UGC




21 जनवरी 2026

नीट छात्रा की हत्या और दुष्कर्म में अपना अपना टार्गेट

नीट छात्रा की हत्या और दुष्कर्म में अपना अपना टार्गेट

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नीट छात्रा की हत्या और दुष्कर्म मामले में  सभी ने अपना अपना टार्गेट सेट कर लिया है। आजकल, ईमानदार और साहसी होने के दावे हम स्वतः करते है। और हमेशा की तरह सोशल मीडिया में कुछ वाह वाही करते हैं तो कुछ गाली देते हैं। 
होना यह चाहिए था कि इस बड़े आपराधिक नेटवर्क को सामने लाने के लिए सारे उपाय किए जाते। साक्ष्य जुटाए जाते। हो यह रहा है कि कहानियां सुनाई जा रही। यहां तक कि छात्रा का चरित्र हनन किया जा रहा। और हो यह रहा कि सभी ने अपना अपना टार्गेट सेट कर किया है।  हो यह रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का धज्जियां उड़ाते हुए व्यू और कमेंट के लिए छात्रा की पहचान, उसकी तस्वीर को उजागर कर दिया गया। 

 हद तो यह है डॉ सहजानंद को टारगेट में ले लिया गया है। जबकि उनकी सहभागिता जितनी होनी थी, वह एक सामान्य चिकित्सक के लिए उचित ही है। पर टारगेट करने का अपना टारगेट होता है। बस वह पूरा हो, यही टारगेट है..!

इस सबके बीच इसमें गर्ल्स हॉस्टल संचालक और मकान मालिक का अवैध और नैतिक नेक्सस, पटना में देह व्यापार में इनकी सहभागिता। इसके राजनीतिक संरक्षण और नेक्सस में राजनीतिक नेटवर्क पर बहुत कम तथ्य आ रहे। जबकि मूल यही है। और पटना से जुड़ा हर आदमी इसे जान, समझ रहा है। हालांकि दैनिक भास्कर ने इसे स्ट्रिंग ऑपरेशन में खुलासा भी किया। असल काम यही करने का है। 

अब आइए केस अनुसंधान पर। एसआईटी ने अपने अनुसंधान को गर्ल्स हॉस्टल से शुरू करके जहानाबाद पर केंद्रित किया है। मतलब, कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ी है। जिसपर सभी चुप है। 

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अब, सरकार और पुलिस की शाख पर प्रश्नचिन्ह है। पहले दिन से ही यह  लगा जैसे पुलिस अपराधियों के बचाव में हो। अब भी यही लोगों की धारणा है कि सब लीपापोती हो जाएगा। कोई बलि का बकरा बनेगा। 

यह सबसे चिंता का विषय है। इसका व्यापक असर बेटियों की शिक्षा पर पड़ेगा। कोई अपनी बेटी को पटना भेजना नहीं चाहेगा। 


गृह मंत्री सम्राट चौधरी का कोई प्रयास नहीं दिखता। बल्कि लोग मान रहे है कि यह नेताओं का भी नेक्सस है। इसीलिए नेता इसमें हरसंभव बचाव में ही काम करेगा।


नीलम अग्रवाल को छोड़ दिया जाना, बर्डेन का गुम हो जाना, बंगाल की लड़की का रहने का कथित दावा, दैनिक भास्कर अखबार के डिजिटल के स्ट्रिंग ऑपरेशन में गर्ल्स हॉस्टल की लड़कियों का देह व्यापार में संलिप्त होने का नेक्सस... छात्रा के शरीर पर जख्मों के निशान, प्रभात हॉस्पिट में मामले को दबाने के लिए 15 लाख का ऑफर, कमरा को साफ किया जाना, कितने प्रश्न है, और उत्तर किसी का नहीं है। जवाब कौन देगा...

उम्मीद है, बिहार पुलिस के डीजीपी विनय कुमार, एडीजी कुंदन कृष्णन, एस आई टी और एसएसपी कार्तिकेय शर्मा इस गुत्थी को प्रमाण के साथ सुलझा कर बिहार की पुलिस से लोगों के टूट रहे भरोसे को टूटने से बचा ले...

06 जनवरी 2026

अरे, लल्लन टॉप, सौरभ द्विवेदी का नहीं था..!

जब कभी कोई कहता है कि समाज में अच्छे लोगों की कद्र नहीं । समाज उनको भूल जाता है। समाज बड़ा निष्ठुर है। तब समाज स्वयं आगे आकर इस बात को गलत सिद्ध करता है।  अभी लल्लन टॉप सौरभ द्विवेदी को लेकर भी यही हो रहा। जिसको देखिए, वही पूछ रहा। वही बता रहा। ऐसे थे। वैसे थे। गजब। एक दम लल्लन टॉप है। 
कोई आदमी कितना बड़ा है, यह इसी से तय होता है। आज लल्लन टॉप वाले सौरभ द्विवेदी  शिखर पर है। इसका प्रमुख कारण, एकपक्षीय पत्रकारिता के युग में इन्होंने संतुलन बनाए रखा। तराजू का पलड़ा किसी ओर कभी झुकता नहीं दिखा। 

और बस इसीलिए तो भरोसा नहीं हो रहा। सब तो इसलिए भी चौंक रहे की अरे 

ई लल्लन टॉप, सौरभ द्विवेदी का नहीं था...?

खैर, बस दो शब्द और

***

वह कौन शख्स है
जो एकदम फक्कड़ 
जैसा हंसता है...

और फिर झट से
चुप हो जाता है ऐसे 
जैसे रोते बच्चे को
मां मिल गई हो..

और देखिए तो
कैसे चौआनियाँ 
मुस्कान के साथ 
आहिस्ते से पूछ लेता है
किसी से भी 
कड़वा प्रश्न....

*****
वह कौन शख्स है
जो छोड़ गया सबको

किस लिए, यह किसी को
नहीं बताया उसने
पर सब जानना चाहते है
कारण...

कारण ही तो महत्वपूर्ण
होता उनके लिए
जो चिंता करते है उनकी
जो सबकी चिंता किया करता है...

और इसी लिए तो सब चिंतित
सौरभ के लिए...

(अरुण साथी)

05 जनवरी 2026

लाला बाबू को भावपूर्ण श्रद्धांजलि

लाला बाबू को भावपूर्ण श्रद्धांजलि

लाला बाबू!
आपका नाम केवल एक व्यक्ति का परिचय नहीं, बल्कि उस चेतना का उद्घोष है जिसने परतंत्रता की बेड़ियों को चुनौती दी। बरबीघा थाना के सामने आपकी प्रतिमा का स्थापित होना किसी साधारण घटना का साक्ष्य नहीं, बल्कि इतिहास के मौन को स्वर मिलने जैसा है। यह प्रयास भले ही लघु प्रतीत हो, पर इसका भाव अनंत है, जैसे सूरज के सामने दीया जलाना, फिर भी आस्था के उजास से भरा।
जिस भूमि के लिए आपने अपना सर्वस्व अर्पित किया, उसी जन्मभूमि में आपको वह स्थान देर से मिला, जिसके आप सहज ही अधिकारी थे। यही विडंबना अक्सर हमारे समाज की नियति बन जाती है। जिस चौक को कभी बथान कहा गया, फिर अंग्रेजी सत्ता के दौर में थाना चौक के नाम से जाना गया, उसी चौक ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में आपके कदमों की गूंज सुनी। धरना, प्रदर्शन और साहस की अग्नि में तपे आपके संघर्ष ने विदेशी सत्ता को चुनौती दी और वही चौक आपके नाम से पुकारा जाने लगा, लाला बाबू चौक।
इस नामकरण का प्रथम स्वप्न तत्कालीन नगर पंचायत अध्यक्ष शिवकुमार जी ने देखा। प्रतिमा स्थापना का शिलान्यास भी हुआ, पर राजनीति की उथल-पुथल में यह स्वप्न समय के धुंधलके में खो गया। उस अधूरे स्वप्न को मैंने आत्मसात किया। दो दशकों तक कलम के माध्यम से, अखबारों के पन्नों पर, आपकी स्मृति को जीवित रखने का सतत प्रयास करता रहा।

आज वह स्वप्न साकार हुआ। मंत्री अशोक चौधरी जी द्वारा शिलान्यास, पूर्व सभापति रोशन कुमार की पहल और अनेक हाथों के सामूहिक श्रम से आपकी प्रतिमा अपने स्थान पर प्रतिष्ठित हुई। राजनीति ने करवटें बदलीं, पर अंततः सत्य और स्मृति ने अपना स्थान पा लिया।

यह मेरे लिए राजनीति नहीं, श्रद्धा है। यह किसी विचारधारा का नहीं, बल्कि इतिहास के प्रति कृतज्ञता का प्रश्न है। लाला बाबू, यह प्रतिमा नहीं, यह हमारी सामूहिक स्मृति का शिलालेख है। इस सद्कार्य में सहभागी सभी हाथों को साधुवाद, और आपको शत-शत नमन।

03 जनवरी 2026

बेचैन संसार, सोशल मीडिया में हाहाकार और मौत का धार्मिकीकरण

बेचैन संसार, सोशल मीडिया में हाहाकार और मौत का धार्मिकीकरण

अरुण साथी 

वागर्थ का दिसंबर अंक के संपादकीय में संपादक शंभू नाथ जी ने ऐसे सवाल उठा दिए हैं जो  बेचैन करता है...!

और यह बेचैनी तब और बढ़ जाती है जब  भीड़ की हिंसा में कथित धर्म के नाम पर मनुष्यता की मौत हो रही है। और यह बेचैनी और अधिक बेचैन करती है जब भीड़ की हिंसा में मरने वाले का धर्म जानकर कर दुख या आक्रोश व्यक्त करने का चलन चरम पर है। इसमें कोई बांग्लादेश में दीपू चंद्र दास सहित कई हिंदुओं की मौत पर उबाल ले रहा तो वहीं अपने ही देश में भीड़ की हिंसा पर चुप्पी रखते है।

इसके ठीक उलट, भारत में मुसलमानों की भीड़ की हिंसा में मौत पर दुनिया भर में कोहराम मचाने वाले, बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या पर चुप्पी साध लेते है। और हिंसा तथा मौत का यह धार्मिकीकरण मनुष्यता को मारने का सबसे घातक हथियार बन गया है।

इसी में बांग्लादेश के क्रिकेटर रहमान को आईपीएल के अपने टीम में लेने पर शाहरुख देश द्रोही हो जाते है, तो बीसीसीआई और आईसीसी के प्रमुख जय शाह इस खरीद पर रोक नहीं लगाने पर भी देश भक्त बने रहते हैं। 

और यह भी , क्रिसमस में भारत में सर्व धर्म समभाव खत्म हुआ। दूसरे धर्म के प्रति असम्मान तीक्ष्ण हुआ। पर हम यह नहीं देखते कि कट्टरपंथ की राह चले, अफगानिस्तान, सीरिया, पाकिस्तान इत्यादि देश आज कहां हैं..?

****
अब जरा गौर करें। बिहार के नालंदा निवासी अतहर हुसैन साइकिल पर सवार होकर धूम धूम कर कपड़ा बेचते थे। नवादा में 5 दिसंबर को धर्म से घृणा की भेंट वे चढ़ गए। पीट पीट कर उनकी हत्या कर दी गई। यह मामला कितने लोगों को पता है...?

23 दिसम्बर को केरल के वलायर थाना क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के राम नारायण को भीड़ ने बांग्लादेशी कह कर पीट पीट कर मार डाला..!

26 दिसंबर को देहरादून में त्रिपुरा के छात्र एंजल चकमा को चीनी समझ कर हत्या कर दी गई...!

सूची लंबी है। पालघर में साधुओं की हत्या, अमृतसर में निगाहों द्वारा हिन्दू युवक की हत्या और वीडियो बना...! अंतहीन सिलसिला है। खैर अब पढ़िए इसे

...

उत्तर आधुनिकता, इस संदर्भ में वागर्थ के दिसंबर अंक के संपादकीय में संपादक शंभू नाथ जी ने कई प्रश्न उठाएं  हैं।

एक प्रश्न देखिए, 

"सत्यमेव जयते सत्य नहीं रह गया। हर बार जीतने वाला और जो सबसे कुशलता पूर्वक प्रचारित है, वह सत्य बन गया..?"

यह कितना बड़ा प्रश्न खड़ा किया है इन्होंने? 

"इतिहास को जब-जब राजनीतिक दृष्टिकोण से दोबारा लिखने की कोशिश होगी कुछ बिंदुओं पर अतीत के प्रति अंध श्रद्धा और कुछ बिंदुओं पर अतीत का विस्मरण या अतीत के महान हिस्सों का विस्मरण घटित होगा...?"

***
"इन दिनों सत्ताएं रामायण के बाली की तरह है। वे विपक्ष की शक्तियों का अपहरण कर लेती हैं। आमना-सामना होने पर विपक्ष का आधा बल हमेशा बाली के पास आ जाता था। आज वही वाली सिंड्रोम है..?"


यह प्रश्न तो अति गंभीर है, 

"उपभोक्तावाद और राजनीतिक भिन्नतावाद द्वारा लोगों का कैसा सांस्कृतिक आत्म हरण है कि मनुष्य कुछ खुद कुछ सोच नहीं पा रहा। वह किसी भी प्रचारित सूचना पर संदेह नहीं कर पा रहा....?"
बस, इस अंतिम पंक्तियों को कई बार पढ़ें। सोचें, क्या आप स्वयं कुछ सोच पाते है या नहीं...यदि हां तो ठीक है, यदि नहीं तो... सत्यानाश...